सर जॉन लॉरेंस की भारत में वापसी


 - सृजन शुक्ला 
क्या खूबसूरती थी हमारे देश की, जब 1850 में भी हमारे देश के लोग अपने देश को धर्म से ज़्यादा तव्वजोह दिया करते थे, फिर आए सर जॉन लॉरेंस, वह शख्स जिसने लोगों को अपने धर्म की रक्षा करना सिखा कर देश के टुकड़े कर दिए. वही समय था जब हमारे देश की लोकप्रियता, एकता और समृद्धि खाक सी हो गई थी, जब लोग सिर्फ धर्म के आधार पर अपनी जान लेने और देने को तैयार हो गए थे.

खूब बलिदान हुआ, लेकिन हमारा देश संभला उन फरिश्तों के रहते जिन्होंने धर्म नहीं बल्कि देश की रक्षा करना सिखाया, जिन्होंने धर्म नहीं बल्कि देश की इज्जत करना सिखाया, जिन्होंने धर्म नहीं बल्कि एक दूसरे के विचारों की इज्जत करना सिखाया और हमारे देश ने फिर अपनी एक समृद्ध पहचान बनाई.

आज फिर कोई आया है सर जॉन लॉरेंस के रूप में, जो हमे धर्म के आधार पर एक सच्चा नागरिक कहना चाह रहा है, जो हमे फिर से बांटना चाह रहा है, जो हमे सिखाने की कोशिश कर रहा है कि देश से पहले धर्म आता है, जो खुद को देशप्रेम लगों की नागरिकता तय करके दिखाना चाह रहा है.

निष्कर्ष यह है कि या तो अब हम अपना देश बचाएं या तो इंतज़ार करें लाखों जान गवां कर हमारे देश के फिर से टूटने का. तुमसे ज़्यादा मेरा है ये भारत सर जॉन लॉरेंस !

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