बापू को पाती....


                                                                                                                        

आदरणीय बापू
नमस्कार.

इस पत्र में हमलोग अपनी बात कहां से शुरू करें कुछ समझ में नहीं आ रहा है. अपना दर्द, अपना संकट, अपनी परेशानी कहां से बयान करूं? ये बात भी समझ में नहीं आ रही है. मगर बताने को, लिखने को बापू बहुत कुछ है. तो आईये कुछ-कुछ बात आपको इस खत के ज़रिए बताने की कोशिश करते हैं. हमलोग गांव मौजा, चंद्रहिया, थाना- मोतिहारी, जिला- पूर्वी चंपारण, मल्लिक (डोम) टोला के रहने वाले हैं. बापू ये वही चंद्रहिया है जहां संभवतः 16 अप्रैल सन 1916 को जसौलो पट्टी जाने के क्रम में अंग्रेज़ कलेक्टर ने आपको रोक दिया था. साथ ही, फौरन जिला छोड़कर चले जाने का फरमान भी थमा दिया था. उम्मीद है बापू आपको ये घटना ज़रूर याद होगी.
बापू, 1916 से लेकर 2019 के बीच चंद्रहिया में, मोतिहारी में, चंपारण में, बिहार में, साथ ही हिन्दुस्तान में भी बहुत कुछ बदल चुका है. उम्मीद है आप सब बदलाव से खुद अवगत होंगे. बापू, अगर कुछ नहीं बदला तो हम क्षुद्रों का जीवन- वही भूख, वही बीमारी, वही अशिक्षा, वही बेरोज़गारी, वही उपेक्षा, वही उत्पीड़न, वही तिरस्कार, आज भी है जो आपने देखा था. जिसके खिलाफ आपने अपने तरीके से लड़ाइयां भी लड़ी थी. बापू वो सारे वकील, बैरिस्टर, पेशकार, ज़मींदार बबुआन जो उस समय आपके साथ आये थे. उन सभी के बाल- बच्चे, विधायक, मंत्री, हाकिम-अफसर, बड़े जोतदार, मिल मालिक, प्रोफेसर, डॉक्टर, ठेकेदार, शिक्षा बन गए. अगर कोई कुछ नहीं बना तो वो है हमारा समाज, हमारा बुतरुआ. चाहे ये समाज चंद्रहिया का हो, भितिहरवा का हो, मधुबन का हो, जसौली पट्टी, सिरसवा-ढोकरहा का हो, छतौनी का हो, बड़हडवा-लखनसेन का हो या बैरिया का हो या देश-प्रदेश के दूसरे जगहों का दलित हो. बापू, आखिर ऐसा क्यों हो गया? आपका दलित वही का वही और सब बबुआन हाकिम-अफसर, मंत्री-विधायक, मालिक-ज़मींदार, डॉक्टर-प्रोफेसर. बापू आप आये तो थे छोटे किसान, मज़दूर, कामगार को गोरे लोगों से निजात करवाने के लिए. मगर कालक्रम में आपका ये हरिजन काले-देसी लोगों का बंधुआ मज़दूर हो गया. आखिर ये कैसे हो गया?
बापू पता है आपको, आपके चंपारण आने के एक सौ साल पूरा होने पर सरकार ने बड़ा-बड़ा काम आपके याद में किया, चंपारण में, मुजफ्फरपुर में, पटना में, हर जगह. सुना है चंपारण में ही खास-खास जगहों पर आपकी मूर्ति लगवाई गयी है. इस एक सौ साल के अवसर पर पार्क बना, सभा भवन और ना जाने क्या क्या बना. मगर हमलोगों के लिए तीन डिसिमिल ज़मीन का इंतज़ाम भी नहीं हुआ जिसमें हम अपनी मड़ई बना सके. दिन भर कमाते, रात में नून-रोटी खाते, चैन की नींद अपने मड़ई में सोते, मगर ऐसा क्यों नहीं हो सका बापू?
बापू आपको पता है, चंद्रहिया मौजा में ही आपके नाम पर बहुत बड़ा भवन बन रहा है. क्या किसी ने या सरकार ने आपको बताया है? बाप रे, लगता है चार-पांच बीघा में यह मकान आपके नाम पर सरकार लोग बनवा रही है. बड़ी-बड़ी मशीनों से काम हो रहा है. बड़े-बड़े लाल लाल पत्थर इसमें लगवाए जा रहे हैं. बड़ा-बड़ा लोहा का गेट लगा है. इसके चारदीवारी के अन्दर आपकी बहुत सी मूर्तियां भी लग रही हैं. लेकिन बापू आपके इस बड़े महल के सामने सड़क के उस पार हम मल्लिक समुदाय (डोम मुसहरी) की कई सारी झोपड़ियां हैं. हमलोग 30-35 परिवार वार्ड संख्या 13 में इसी सड़क के ढलान पर मड़ई बना कर रहते हैं. बापू इस झोपड़-पट्टी में हम सभी लोगों के मड़ई की ज़मीन का पट्टा भी हमारे नाम से नहीं है. बापू ना इस झोपड़-पट्टी में ना पीने का उचित पानी है, चापाकल है तो वो भी खस्ताहाल, ना ही शौचालय है. बच्चों के लिए स्कूल भी बबुआन पट्टी में है, जहां वो जाने से डरते हैं. कुछ साल पहले हमलोगों को इंदिरा आवास योजना की मदद भी मिली थी वो भी आधी अधूरी. कुछ मिला, कुछ बिचौलियों ने ले लिया. हम सभी लोग डलिया, सूप, मौनी, छितना बनाते हैं और इसी को बेचकर नून-रोटी की व्यवस्था करते हैं. हमलोगों का रोज़गार भी फायेदा का नहीं है. मगर करें भी तो क्या करें? बापू कुछ समझ में नहीं आता. हां, हाल में ही हमारे तोले में बिजली आ गयी है.
बापू, हमलोगों ने लग भीड़ कर आधार कार्ड तो बनवा लिया लेकिन अगर आप सरकार को कह देते तो हमारे झोपड़ी का भी इंतेज़ाम हो जाता. बोल देंगे ना बापू? बापू, कुछ दिन पहले ही हमारे टोला में आंबेडकर बाबा के कुछ लोग आये थे. उन्हीं लोगों से जाना कि कुछ दिनों के बाद आपकी 150वीं जयंती मनाई जायेगी. इस अवसर पर बड़े-बड़े कार्यक्रम होंगे. आपको याद किया जाएगा. अफसर-मंत्री भी आने वाले हैं, ऐसा हमें बताया गया. इस मौके पर ही गांव-गांव, शहर-शहर आपकी कहानी सुनाई जायेगी. गीत-भजन गाये जायेंगे. बापू, क्या ये मंडली हमारे डोम-मुसहर टोला में आएगी? क्या ये हमारी मुसहरी में भी ये मंडली बैठकर हमें आपकी कहानी सुनाएगी? बापू, सरकार से कहिये ना कि ये मंडली हमारे टोला में भी भेजे. हम उनका काफी आदर-सत्कार करेंगे, पकवान भी खिलाएंगे. बापू सरकार से, मंत्री जी से, हाकिम लोग से कह देंगे कि हमारे जैसे हज़ारों मुसहरी में, डोम टोली में, हरिजन बस्ती में, बच्चों के लिए स्कूल, स्कूल में भोजन, पढ़ाने के लिए मास्टर, बच्चों के लिए किताब पोशाक, बसने के लिए दो-तीन धूर ज़मीन, पीने का साफ पानी, शौचालय, रोज़गार के लिए बैंक से कर्ज़ा, वृद्धों को पेंशन का इंतज़ाम करवा दिया जाए. बापू, हम तकलीफ में जीने को मजबूर हैं. हमारा जीवन नरक का जीवन बन गया है. बापू, आखिर कब तक हमारा समाज मलीन बस्ती में अपना जीवन बिताएगा? बापू हम भी मतदाता हैं, वोट देते हैं, सरकार बनाते हैं. हमारे भी कुछ अधिकार हैं, वो अधिकार भी हमें मिलने चाहिए ना बापू?
अंत में बापू, सादर नमन.

हे राम.
हे राम.
हे राम.


आपके विश्वसनीय,
राजेन मलीक
उमा मलीक
चन्द्र देवी, पति- गोला मलीक
रूपा देवी, पति- रामबाबू मलीक
सगईया मलीक
ग्राम+पोस्ट- चंद्रहिया, वार्ड संख्या 13
थाना- मोतिहारी, पूर्वी चंपारण.        




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