गोदी मीडिया के दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी की अहमियत


साल 1780, भारत में पहली बार अखबार यानी समाचार पत्र प्रकाशित हुआ. नाम “बंगाल गज़ट”, एक अंग्रेज़ जिसका नाम जेम्स हिक्की था उसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ प्रतिरोध के तौर पर ये अखबार शुरू किया था. उसके बाद कंपनी और बाद में ब्रितानी तख़्त के खिलाफ कई अखबार निकले. भारतेंदु की कवि वचन सुधा से लेकर केसरी जैसे अखबारों ने अंग्रेजों की हालत खराब कर दी. 

इसी तरह एक अखबार उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में 9 नवंबर 1913 से शुरू हुआ, नाम-साप्ताहिक प्रताप.
इस अखबार को शुरू करने का काम शिव नारायण मिश्र, गणेश शंकर विद्यार्थी, नारायण प्रसाद अरोड़ा और कोरोनेशन प्रेस के मालिक यशोदा नंदन ने मिलकर किया था.


चारों ने 100-100 रुपये की पूंजी का योगदान दिया था. 400 रुपये की रकम से चार रुपये महीने किराये के मकान से 16 पृष्ठ का ‘प्रताप’ शुरू हुआ था. पहले साल से पृष्ठों की वृद्धि का सिलसिला बढ़ा तो फिर बढ़ता ही रहा.
20 से 24 फिर 28, 32, 36 पृष्ठों का सफ़र तय करते हुए ‘प्रताप’ 40 पृष्ठ तक पहुंच गया. 1930 में 40 पृष्ठ के ‘प्रताप’ का सालाना मूल्य साढ़े तीन रुपये था.
कुछ ही दिन बाद यशोदा नंदन और नारायण प्रसाद अरोड़ा अलग हो गए. शेष शिव नारायण मिश्र और गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ को अपनी कर्मभूमि बना लिया.
प्रताप वही अखबार है जिसमें भगत सिंह ने भी कुछ महीनों तक काम किया.

आज उसी प्रताप के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत दिवस है. गणेश शंकर विद्यार्थी ने आज ही के दिन साल 1931 में एक सांप्रदायिक दंगें को रोकने की कोशिश में अपनी जान दे दी.

गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘स्वराज’ अख़बार से उर्दू में लिखना शुरू किया कि इस बीच पंडित सुंदरलाल के सानिध्य में वह हिंदी की ओर आकृष्ट हुए.
एक लेखक और पत्रकार के रूप में उनकी विधिवत शुरुआत 2 नवंबर 1911 से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ पत्रिका से होती है.
द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के सानिध्य में उन्हें अपने साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्कारों को विकसित करने का अवसर मिला तो मदन मोहन मालवीय के अखबार ‘अभ्युदय’ के ज़रिये अपने राजनीतिक विचारों को आकार दिया.
गणेश शंकर विद्यार्थी ना सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी पत्रकारिता को प्रयोग में लाते थे बल्कि ज़मींदार और जाति व्यवस्था पर भी गहरी चोट करते थे. इसी कारण से वो सरकार और ज़मींदारों के नज़र में रहने लगे. गणेश शंकर विद्यार्थी को 5 बार जेल की सजा सुनाई गयी. साल 1922, इस बार उन्हें जेल हुई थी मानहानि के केस में. विद्यार्थी जी ने जनवरी, 1921 में अपने अखबार में एक रिपोर्ट छापी थी. रायबरेली के एक ताल्लुकदार सरदार वीरपाल सिंह के खिलाफ. वीरपाल ने किसानों पर गोली चलावाई थी और उसका पूरा ब्यौरा प्रताप में छापा गया था. इसलिए प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी और छापने वाले शिवनारायण मिश्र पर मानहानि का मुकदमा हो गया. ये मुकदमा लड़ने में उनके 30 हजार रुपये खर्च हो गए.
पर प्रताप इस केस से फेमस हो गया. खासकर किसानों के बीच. विद्यार्थी जी को भी सब लोग पहचानने लगे. उनको लोग प्रताप बाबा कहते थे. इसी दौरान उन पर केस चला, गवाही हुई. गवाह के रूप में इस केस में मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू भी पेश हुए थे. और सारी गवाही होने के बाद, फैसला ताल्लुकदार के फेवर में गया. दोनों लोगों पर दो-दो केस थे. और दोनों लोगों को 3-3 महीने की कैद और पांच-पांच सौ रुपये का जुर्माना हुआ.
1931 का वक्त था. सारे कानपुर में दंगे हो रहे थे. मजहब पर लड़ने वालों के खिलाफ जिंदगी भर गणेश शंकर विद्यार्थी लड़ते रहे थे, वही मार-काट उनके आस-पास हो रही थी. लोग मजहब के नाम पर एक-दूसरे को मार रहे थे. ऐसे मौके पर गणेश शंकर विद्यार्थी से रहा न गया और वो निकल पड़े दंगे रोकने. कई जगह पर तो वो कामयाब रहे पर कुछ देर में ही वो दंगाइयों की एक टुकड़ी में फंस गए.
ये दंगाई उन्हें पहचानते नहीं थे. इसके बाद विद्यार्थी जी की बहुत खोज हुई, पर वो मिले नहीं. आखिर में उनकी लाश एक अस्पताल की लाशों के ढेर में पड़ी हुई मिली. लाश इतनी फूल गई थी कि उसको लोग पहचान भी नहीं पा रहे थे. 29 मार्च को उनको अंतिम विदाई दी गई. उनकी इस तरह हुई मौत इस बात की गवाही देती है कि गणेश शंकर विद्यार्थी जितना अपनी कलम से एक्टिव थे उतना ही वो रियल लाइफ में भी एक्टिव थे.
गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत दिवस पर महात्मा गांधी ने सन्देश भेजवाया था -
‘कलेजा फट रहा है तो भी गणेश शंकर की इतनी शानदार मृत्यु के लिए शोक संदेश नहीं दूंगा. उनका परिवार शोक संदेश का नहीं बधाई का पात्र है. इसकी मिसाल अनुकरणीय सिद्ध हो.’





लेकिन क्या आज के पत्रकार भी गणेश शंकर विद्यार्थी के इस आदर्श के साथ पत्रकारिता करते हैं? या इसके उलट वो सांप्रदायिक भेदभाव बढ़ाने का काम करते हैं? 







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