मेरे समय में राष्ट्रवाद





- प्रियंका प्रियदर्शिनी 

'देशभक्ति', यह शब्द मेरे दौर में बड़ा प्रचलित रहा है. जब मेरे देश भारत में 2014 के पश्चात एक दीर्घकाल से चली आ रही राजनीतिक पार्टी की शिकस्त होती है और एक हिन्दू राष्ट्र के सपने से लबरेज़ पार्टी स्वयं को राष्ट्रहित में सनातन धर्म की प्रासंगिकता को जनमानस के भीतर स्थापित करना चाहती है और जनता की तमाम दुखती नसों को भापकर अपना चुनावी घोषणा पत्र तैयार करती है. इस तरह से एक हिंदू-सनातनी पार्टी का उदय होता है. जिसमें वह जनता को पूर्व की सरकारों की विफलताओं को उंगलियों पर गिन लेने कहती है. 


महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, कालाधन, असमानता जैसे तमाम शब्दों को भी बहुत भाव दिया गया और मासूम जनता ने देश की बेहतरी के लिए एकजुट होकर इस पार्टी का स्वागत किया और भारत की सत्ता उनके हाथों में सौंपी.

सत्ता में आने के पश्चात इस पार्टी ने अपने विचारों को जनमानस का विचार बनाने हेतु लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपना करीबी बनाती है. देश-विदेश के तमाम पूंजीपतियों से पार्टी का रिश्ता गहरा जाता है. निजीकरण जैसे देश के विकास का एक मात्र तरीका नज़र आता है. भारत के संविधान में कई प्रकार के छेड़-छाड़ किये जाते हैं और एक-एक करके राष्ट्रवाद और देशभक्ति जैसे शब्दों के प्रखर व व्यापक प्रचार से जनता के अधिकारों को बड़े शातिर तरीके से उनसे छीना जाता है लिया जाता है.

जनता की मानसिक चेतना को प्रतिदिन पत्रकार बंधुओं की सहायता से विकलांग बनाया जाता है. राष्ट्रवाद और अपने देश से प्रेम करने का अर्थ यह रह जाता है की सरकार की बनाई नीतियों और कानूनों को जनता बिना किसी प्रश्न के चुपचाप स्वीकृति प्रदान करे. इस वक्त मेरे देश का राष्ट्रीय पताका तिरंगा भी उस पार्टी के झंडे के समक्ष बौना प्रतीत होता है.


इस नयी सरकार के नेतृत्व के कुछ 6 वर्ष बीत गए. लेकिन राष्ट्र की स्थिति पूर्व के समान बनी रही और आर्थिक स्थिति में तो पायदान हमारा नीचे खिसक गया. बेरोजगारी 45 वर्षों में चरम पर आ गयी. किसानों के आत्महत्याएं थमने का नाम नही ले रही थी. हालात ऐसे हो गए कि सरकारी वेबसाइटों से डाटा हटा दिए गए. कालाधन देश में वापस लाने के लिए बिना तैयारी के नोटबन्दी किये गए, सैंकड़ों जाने गयी, जीएसटी लाया गया, जिसने छोटे व्यापारियों की हालात खराब कर दी. हालांकि नोटबन्दी जिसके लिए किया गया वो हो न सका. आतंकवाद-नक्सलवाद जैसी घटनाएं अपनी जड़ उसी मजबूती से जमाये रही और विदेशी बैंको में काले धन सफेद हो गए. खैर छोड़िये राष्ट्रवाद व देशप्रेम, देशभक्त पर आते हैं.

क्या होता है 'राष्ट्रवाद'? कौन होते हैं देशभक्त? 

क्या विश्व के अलग अलग भू-भाग को अधिकृत कर अपनी-अपनी सीमा तय कर चुके विभिन्न विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में निवास कर रहे लोग, राष्ट्रवाद की खेती करते हैं?

क्या 'देशप्रेम' टीकाकरण द्वारा जन्म के तुरंत पश्चात दिया जाता है?

या फिर अपनी सीमा के भीतर आने वाले तमाम भौगोलिक खण्डों, जंगल,जमीन,पर्वत,मैदान,नदियों,समुद्र,रेगिस्तान आदि पर अपना अधिकार करके कोई राष्ट्रवादी हो जाता है?

मुझे लगता है, राष्ट्रवादी होने के लिए सर्वप्रथम जीवित होना होता होगा. किसी भी भौगोलिक सीमा के भीतर अपने जीवन के अधिकार को, कर्तव्य समझकर उस सीमा के भीतर आने वाले सभी एककोशकीय से बहुकोशकीय जीवों से धर्म-जाती से परे प्रेम करना होता होगा. अपनी क्षमता के श्रम शारीरिक अथवा मानसिक: को उस भौगोलिक तय सीमा के भीतर आने वाले जीवों तथा प्राकृतिक संपदा का समुचित प्रयोग जीवों की तथा उस भू-भाग की बेहतरी के लिए करना होता होगा.

मेरी चेतना के अनुसार जीवाणुओं की वो तमाम लाभकारी प्रजातियाँ जो मेरे देश में निवास करती है,राष्ट्रवादी है.
मेरे हिसाब से 3 वर्ष का वो बच्चा राष्ट्रवादी है जो विद्यालय पढ़ने जाता है. वो माता-पिता देशभक्त हैं, जो अपनी क्षमता से अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा व स्वास्थ्य देते हैं. हमारा किसान राष्ट्रवादी है. देश की सीमा पर तैनात जवान और अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्था में अपनी सेवा दे रहे तमाम नागरिक देशप्रेमी है. अस्पताल का पूरा परिवार देशभक्त है. विश्वविद्यालय के तमाम अध्यापक व छात्र-छात्राएं देशभक्त हैं. बैंककर्मी, सब्ज़ीवाला, दूधवाला, ठेलावाला, मछलीवाला, सारे अमीर-गरीब, दलित- ब्राह्मण, समाजसेवी व विपक्षी पार्टियां: अपनी क्षमता से देश के बेहतरी व विकास से लिए अपनी सेवा दे रहे हैं वो सारे नागरिक राष्ट्रवादी हैं, देशभक्त हैं, देशप्रेमी हैं.

किन्तु दुःख की बात यह है कि आज मेरे राष्ट्र में राष्ट्रवाद और देशप्रेम की परिभाषा बदलकर उसे किसी व्यक्ति विशेष, धर्म विशेष, रंग विशेष, भाषा विशेष के इर्द गिर्द लाकर खड़ा कर दिया है. पहले देश में 98% जनता देशप्रेमी, राष्ट्रवादी थी और अचानक 2014 के पश्चात राष्ट्रवादियों की संख्या में अप्रत्याशित गिरावट हुई. आज हमारे देश में गरीबी और कर्ज से दबा किसान जो आत्महत्याएं कर रहा है वो देशभक्त नहीं है. वो जवान जो सेना के भीतर चल रहे दुर्व्यवहार पर प्रश्न करता है वो राष्ट्रवादी नहीं है. विश्वविद्यालय के छात्र जो सत्ताधारी पार्टी से प्रश्न करते हैं वो देशभक्त नही हैं. वो नागरिक जो किसी धर्म विशेष का नहीं है वो आशंकित दृष्टि से देखा जाता है और अगर वो मुसमलमान है तब तो उसके राष्ट्रवादी होने की कोई गुंजाइश हीं नही है. हमारे देश का वो चिकित्सक जो हजारों मासूम बच्चों की जान बचाता है और सरकार वहां अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए उस चिकित्सक को हत्यारे के रूप में प्रस्तुत करती है. वह चिकित्सक भी देशभक्त नही रहा इस नई राष्ट्रवादी सत्ता में. वो तमाम लोग जो चुपचाप सरकार द्वारा बनाई नीतियों का स्वागत नही करते, देशभक्त नही हैं.


राष्ट्रभक्त होने का तरीका-

लेकिन बहुत मुश्किल नहीं है, आज भी देशभक्त होना राष्ट्रवादी होना. आप स्वयं को राष्ट्रवादी सिद्ध करने के लिए सत्ताधारी पार्टी द्वारा चुने कुछेक स्लोगन को अपनी पूरी ऊर्जा के साथ लगाकर किसी रंग विशेष को अपनाकर किसी पार्टी विशेष में शामिल होकर आप भी बड़ी आसानी देशभक्त हो सकते हैं. आप अपने अपने द्वारा चुने सत्ताधारी नौकरों द्वारा बनाई नीतियों को बिना पढ़े बिना उसपर अपनी राय बनाये बिना अपनी समझ से उसपर टिप्पणी किये सिर्फ व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी और IT सेल द्वारा फैलाये जा रही बातों को अटल सत्य मानकर आप देशप्रेमी,राष्ट्रभक्त हो सकते हैं. और सबसे अधिक राष्ट्रवादी वही लोग हैं जो आज भी मनुवादी हैं.

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