क्या सरकारी स्कूल के बच्चों को अच्छी शिक्षा का अधिकार नहीं है?


अमृता सिंह


आज भी सरकारी विद्यालयों में लड़कियों के लिए शौचालय की सुविधाएं नही हैं और जहां हैं भी वहां शिक्षक उसका प्रयोग कर रहे हैं। बच्चों को जाने की अनुमति नहीं दी जाती है चाहे वह छात्र हो या छात्रा कारण यही है कि सफाई कौन करेगा अगर सफाई कर्मी होता तो बच्चे भी जाते परन्तु सफाई कर्मी का अभाव है और ना तो कोई  चपरासी की नियुक्तियां है । शिक्षक अगर जाने भी दें तो शौचालय गंदा होने के बाद चपरासी ना होने के कारण उनका काम इन बच्चों से करवाया जाता है जैसे झाड़ू लगाना, शौचालय साफ करना इत्यादि। यही कारण है कि शौचालय बहुत गंदा भी रहता है और बच्चों को भी इसलिए नहीं जाने देते क्योंकि यदि बच्चे उसका प्रयोग करने लगे तो शिक्षकों का शौचालय भी दूषित हो जाएगा। यही कारण है कि कुछ लड़कियां  विद्यालय के शौचालयों का प्रयोग करने की जगह खेतों में शौच करने चली जाती हैं। प्रधानमंत्री के 'हर घर शौचालय' योजना से तो लोग जागरुक हो रहे हैं लेकिन वह जागरुकता हमारे स्कूल में देखने को नहीं मिली है।


मिडिल स्कूल जहां पांचवी से आठवी कक्षा के बड़े छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं वहां तमाम तरह की सुविधाएं होनी चाहिए जैसे हैंडवाश, सेनेटरी पैड्स एवं अन्य व्यवस्थाएं पर इसके नाम पर आज भी हमारे सरकारी विद्यालय बहुत पीछे है। यह बात रही सरकारी स्कूलों की।अब आते हैं हाई स्कूल की बात पर,यहां कहीं शौचालय में दरवाजा नहीं तो कहीं पानी नहीं मिलता। लड़कियां कैसे जाएं आज भी यह सोचना पड़ता है। 20 परसेंट स्कूलों में आज के समय में भी बिजली नहीं पहुंचती है।


एक ओर जहां Kent के प्रचार प्रसार से पूरे देश के लोग साफ पानी पी रहे हैं, वहीं 90% सरकारी स्कूल के बच्चे आज भी वही गड्ढे के बगल वाले चापकल से पानी पी कर अपनी प्यास बुझा रहे हैं। सरकार खिचड़ी और मिट्टी मिलाकर खाना तो उपलब्ध करवाती है लेकिन प्यास बुझाने की व्यवस्थाओं के बारे में सोचती भी नहीं। प्रधानाध्यापक से सवाल पूछने पर वह कहते हैं कि आर•ओ लगाने के लिए पैसे नहीं आते। यही हमारे स्वच्छ और सुंदर भारत की व्यवस्थाएं हैं जो आने वाले देश के सिपाहियों को गंदा पानी पीने पर मजबूर कर रही हैं। हर सरकारी विद्यालय में बच्चों को ड्रेस तो प्रदान करा दी गई है लेकिन साफ है या नहीं यह कोई नहीं देखता, और शायद उनके पास इतने पैसे भी नहीं होते कि ड्रेस साफ करवा सकें।



भारत में शिक्षा के लिए खर्च होने वाली धनराशि का सिर्फ 11% शिक्षा में निवेश होता है और बाकी का 89% खर्च विभिन्न सरकारी विभागों में बंट जाता है। एक सर्वे के अनुसार जो कि 13 राज्यों के 780 सरकारी स्कूलों में किया गया है बताता है कि इसी कारण सरकारी विद्यालयों की दयनीय स्थिति है। भारत में दो या तीन राज्यों को छोड़कर शेष राज्यों में शिक्षा की दिशा-दशा दोनों की ही दुर्दशा होती जा रही है। सरकारी विद्यालयों की गरीबी के कारण पढ़ाई पर भी असर पड़ रहा है। प्रोत्साहन राशि के बदौलत संख्या तो बढ़ रही है लेकिन व्यवस्थाएं लड़खड़ा रही हैं। इन विद्यालयों में वही छात्र-छात्राएं आते हैं जिनके माँ-बाप मजदूरी करते हैं। उन संख्याओं में से भी 20% बच्चे छात्रवृत्ति मिलने के कारण आते हैं।

पहाड़ी क्षेत्रों के 30% स्कूल में आज भी बच्चे कंप्यूटर से तो परिचित ही नहीं हैं। 10% विद्यार्थी अपने शिक्षकों से भी परिचित नहीं है क्योंकि शिक्षक सप्ताह में 2 दिन आते हैं और अपनी उपस्थिति बना कर चले जाते हैं खिचड़ी का चूल्हा रोज चढ़ता है लेकिन ब्लैक बोर्ड पर लिखाई नहीं होती है।
बिहार में सर्व शिक्षा अभियान के तहत कुछ नियुक्तियां की गई थीं जिसमें शिक्षकों की नियुक्तियां पंचायत लेवल पर मुखिया जी के द्वारा की जाती थीं लेकिन वह भी पैसे-रिश्वत लेकर किया जाता था। यह शिक्षक  Sunday को Sonday लिखते हैं।



एक सर्वे के मुताबिक तीसरी क्लास के बच्चे पहली क्लास के अक्षर ज्ञान की पुस्तकें नहीं पहचान पाते और पांचवी क्लास के बच्चे तीसरी क्लास की पुस्तक नहीं पढ़ पाते और आठवी कक्षा के बच्चे पांचवी कक्षा की गणित नहीं कर पाते। 20% बच्चों की यही स्थिति है।


एक सर्वे के अनुसार आज 70% हाई स्कूल के बच्चे प्रयोगशाला के नाम से परिचित ही नहीं हैं।
प्रयोगशाला तो छोड़िए वहा शिक्षक की भी कमियां है
जहां 30 बच्चों पर एक शिक्षक होने चाहिए वहां 75 बच्चों पर 1 शिक्षक है। आम गांव के हाई स्कूल में 20 से 30 गांव के बच्चे पढ़ने आते हैं और वहां शिक्षक की इतनी कमी देखनी पड़ रही है। एक बच्चे से पूछने पर उसने यह जवाब दिया कि "साइकल से चलकर कोसों दूर से  हम पढ़ाई करने को आते हैं लेकिन हम पढ़ाई नहीं कर पाते हैं क्योंकि शिक्षक जनगणना की ड्यूटी पर गए हैं , तो इलेक्शन की ड्यूटी लगी है जो शिक्षक है उनसे भी हमें पढ़ाई नहीं मिल पाती है।" कल खिलने वाले फूलों को आज  पानी ही नहीं मिला रहा है।


संपादकीय: किसी महापुरुष ने कहा है कि "बच्चों को विद्यालय जाना पसंद तो नहीं होता पर विद्यालय ही उनकी ज़िंदगियां बदलता है" परन्तु सरकारी विद्यालयों के मामले में यह कथन झूठा साबित होता दिख रहा है। यदि हमें इन विद्यालयों की यह दशा बदलनी है तो सरकार का इन विद्यालयों के प्रति व्यवहार औेर सोच भी बदलना पड़ेगा।

Comments

  1. EY bhut Accha phel h Aapka iswar Aapke help kre ismai HM savi desh wasiyo ko gambhir SE vichar Karna cheye qki padheyga India tavi badeyega India

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  2. बहुत बढ़िया अमृता जी !आपके जैसे जिम्मेवार नगरिक हो तो हर गांव का हर विद्यालय सुधर जाए ! ये उम्मीद किया जा सकता है ! ये आपकी काफी सराहनीय पहल है ! आपकी ये पहल शायद इन्हें अपनी कर्तब्य का बोध कराये !

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