आज का जनप्रतिनिधि

- अमृता सिंह 


जैसा कि हम सभी को पता है कि भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. यहां की शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक है. जनता निर्णय लेती है कि हमारा नेता कौन होगा. आज जनता वोट देकर तय कर ही रही होती है कि उनका नेता कौन बनेगा और जनप्रतिनिधि कल सुबह ही जनता को पहचानने से इनकार कर देता है. भारत लोकतंत्र तो अब भी कहा जाता है लेकिन अब यह लोकतंत्र दूषित हो चुका है. अब के लोकतंत्र से कई गुना बेहतर तब के राजतंत्र थे. उसमें राजा अपनी प्रजा की तकलीफ़ को सुनते थे, उनसे जा कर मिलते थे लेकिन आज जनता को सिर्फ़ प्रतिनिधि चुनने का अधिकार रह गया है. हमारे संविधान की प्रस्तावना में लिखा है "We the People of India" लेकिन हमारा नेता पूछता है "Who the People of India"

अब के समय में हम अपने  मुखिया, सरपंच, जिला पार्षद, विधायक और सांसद को वोट तो देते हैं लेकिन बिना चमचागिरी के हम उनसे मिल नहीं सकते.
 तदनुसार ग्रामीण क्षेत्रों से हम सभी वाकिफ़ हैं लेकिन तब के राजा जनता के हर पक्ष को सुनते थे. अब के मुखिया बाहुबली चेहरे देखकर बातें करते हैं. एक निर्दोष व्यक्ति की ना कर के बल्कि एक हत्यारे बाहुबली की ज्यादा मदद करते हैं.

हम सभी जानते हैं कि हमारे अधिकारी और नेता सभी भ्रष्ट हैं पर हम इसके बारे में कुछ कर नहीं पाते. यहां वोट खरीदने से लेकर सभी योजनाओं में अत्यधिक टैक्स एक मुख्य बाधा है. कृषि कल्याण योजना में किसानों तक पैसा पहुंच तो जाता है पर इतना टैक्स देने के बाद उनके पास बचता ही क्या होगा.
अपने सारे काम जारी रखने के लिए जनता को यह अत्यधिक टैक्स और भ्रष्टाचार के रूप में पैसा देना ही पड़ता है. लंदन स्थित The Economic Intelligence Unit हर साल दुनियाभर के देशों के लिये डेमोक्रेसी इंडेक्स यानी लोकतंत्र सूचकांक जारी करता है. 2018 के लिये 167 देशों का यह सूचकांक जारी किया गया और इसमें भारत 141वें स्थान पर था लेकिन 2020 रिपोर्ट के अनुसार भारत 10 पायदान पीछे चला गया है. भारत अब 151वें स्थान पर है.

अब की राजनीति का पेशा कुछ ऐसा ही हो गया है:
(1) धर्म की राजनीति
(2) बाहुबली
(3) भ्रष्टाचार
(4) जातिवाद
(5)भगवा बुरखा टोपी त्यागी

 हम सभी को मालूम है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा, दो बार राष्ट्रपति रह चुके हैं. राष्ट्रपति पद से हटने के बाद वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं लेकिन भारत में ग्रामीण स्तर पर सरपंचों और मुखियाओं के कुर्सी से हटने के बाद उनकी पुश्तें भी बाहुबली बन कर रहती हैं. यह हैं हमारे जनप्रतिनिधि.

हमारे स्वच्छ लोकतंत्र को कब तक बाहुबली लोग दूषित करते रहेंगे. अन्याय तो इतना हद तक बढ़ गया है कि बाहुबलियों और हत्यारों का ही पलड़ा भारी रहता है. आज की युवा पीढ़ी इसे अपनी जिम्मेदारी मानकर आसानी से सुधार और बदलाव ला सकती है. अगर सत्ता की गद्दी पर कोई अहंकारी राजा बैठा हो तो उसे सत्ता के गलियारे से खींचकर निकालना हर युवा चाणक्य का कर्तव्य है. स्वामी विवेकानंद के वचन हमें बतलाते हैं कि अन्याय करने वाले से ज्यादा दोषी अन्याय सहने वाला होता है. अन्याय को न्याय तक और असत्य को सत्य तक पहुंचाना हर युवा का कर्तव्य है. युवाओं देश\ संभालो, अब तुम्हारी बारी है.

Comments

Popular posts from this blog

मैं बिहारी मज़दूर

Communal Politics

Yes, I am a Kashmiri