गिनती

- सुशील कुमार



जागो...जागो,
सिपाही की अवाज़ से अधिकांश की नींद टूटती थी.
सिपाही के साथ सजायाफ्ता कैदी भी होते थे.
सिर दिखाइए, थोड़ा हिलिए,
यही यांत्रिक क्रम रोज शुरू होता था.
राम, 2,3,4...,
पूरी गिनती के बाद फिर से गेट बंद कर दिया जाता था.
बारी-बारी से सभी कमरों की गिनती पूरी हो जाने के बाद
पुनः गेट खुलता
और घंटी बजते ही अधिकांश लोग फील्ड की तरफ रुख मिलाते थे.

सुबह, दोपहर और शाम,
तीन बार गिनती होती थी.
सच पूछिए तो,
यही वह समय था
जब जेल में  होने का एहसास होता था.

सिपाही और सज़ायाफ्ता कैदी गिनती की प्रक्रिया पूरा करते थे.
सुबह में तो गिनती आसानी से हो जाती थी,
लेकिन दोपहर और शाम की गिनती में,
थोड़ी देर हो जाना आम बात थी.
दोपहर में, कोर्ट की पेशी में चले जाने वालों की गिनती अलग से होती थी.
इस ही समय,
किसी दूसरे वार्ड में बात करने
या किसी परिचित से मिलने चले जाने वाले कैदियों को
देरी होना भी स्वाभाविक था.
गिनती में एक भी गड़बड़ हो
तो फिर खैर नहीं!

संपादकीय- सुशील कुमार स्टूडेंट एक्टिविस्ट हैं और अपनी आवाज़ बुलंद करने की वजह से अक्सर जेल में रहते हैं. ये डायरी उन्होंने जेल के दौरान लिखी जो आप 'जेल डायरीज़' सीरीज़ में पढेंगे.

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