इरफ़ान से मेरी पहली मुलाकात

- आमिर 

मैं 10th का एग्जाम दे रहा था और साइंस का पेपर हो चुका था, मैथ्स का पेपर 5 दिन बाद था. पढ़ाई तो पूरी हो चुकी थी इसीलिए सोचा कि कोई फिल्म देख लेता हूं. मामू ने एक फिल्म बताया- पान सिंह तोमर. उस दौरान हमारे लिए फिल्मों का मतलब होता था कोई चार्मिंग सा हीरो और गाने लेकिन ये फिल्म इन सभी चीज़ों से कोसो दूर थी. लेकिन फिर भी अपने दोस्त के साथ पान सिंह तोमर फिल्म देखने पटना के मोना सिनेमा हॉल में जाते हैं. आगे जो होता है वो बिलकुल जादू जैसा था. फिल्म में कोई गाने नहीं, कोई आइटम सॉंग नहीं लेकिन फिर भी इरफ़ान की एक्टिंग और तिग्मांशु धुलिया के डायरेक्शन ने फिल्म को बहुत ज़बरदस्त बनाया.इसके बाद सिलसिला शुरू. सबसे पहले एग्जाम के बाद फिल्म देखी- मकबूल. इरफ़ान खान, तब्बू, पीयूष मिश्रा और पंकज कपूर जैसे अभिनेता और ज़बरदस्त ट्विस्ट.

फिल्म से लौटते वक्त मेरी और मेरे दोस्त के साथ बस यही बात हो रही थी कि यार ये बंदा बहुत भयंकर एक्टिंग करता है मतलब कुछ बवाल ही कर देता है यार.
इसके जस्ट बाद फिल्म आती है 'साहब,बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स'. अगर आप इरफ़ान खान के असली फैन हैं तो आपको इस फिल्म का एक सीन ज़रूर याद होगा. "प्रभु तिवारी क्या है?" अगर आपको ये सीन नहीं याद है आज ही ये फिल्म दुबारा देखिए. ये वही सीन है जब इरफ़ान एक रिपोर्टर बन कर एक पॉलिटिशियन का इंटरव्यू लेने जाते हैं. ये सीन देखकर हमलोग हमेशा ही इरफ़ान की नक़ल किया करते थे. मैं और ईशान मामू अपने घर के सबसे बड़े इरफ़ान के फैन थे. और फैन होने के नाते हमलोगों ने इरफ़ान की एक एक फिल्म देख डाली और हमलोगों ने सारे डायलोग रट जाते थे. मकबूल, पीकू, लंचबॉक्स, ब्लैकमेल, मदारी, लाइफ ऑफ़ पाई, साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स, हिंदी मीडियम, हैदर, एक डॉक्टर की मौत, कितनी ही फ़िल्में हैं जो हमारी फेवरेट थी.

एक डॉक्टर की मौत हम दोनों ने एक फिल्म फेस्टिवल में देखने गए थे और उस फिल्म को देखने के लिए कई किलोमीटर दूर साइकिल से गए थे सिर्फ इरफ़ान के अभिनय के लिए.
इरफ़ान की आखिरी फिल्म अंग्रेज़ी मीडियम हॉल में नहीं देख पायें इसका अफ़सोस हमेशा रहेगा. इसके प्रमोशन के दौरान इरफ़ान की तबियत ख़राब ही चल रही थी इसीलिए उन्होंने एक ऑडियो मैसेज भेजा था.


इरफ़ान काफी दिनों से बीमार चल रहे थे और कैंसर का इलाज लन्दन में चल रहा था. वहां से उन्होंने एक ख़त लिखा था- मैं हार मानता हूं. 
बहुत ख्वाहिश थी मन में कि एक फिल्म की कहानी लिखूं जिसमें अभिनय इरफ़ान करें. ये ख्वाब तो अधूरा रह गया लेकिन एक अफ़सोस और है कि अब और फ़िल्में देखने नहीं मिलेंगे. इरफ़ान आपका काम तो हमारे साथ हमेशा है और एक फैन होने के नाते बहुत अजीब सा महसूस हो रहा है लेकिन एक डायलॉग याद आ रहा है-  
"बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत बनते हैं पार्लियामेंट में."

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