बढ़ती सभ्यता, सिकुड़ते वन
मानसी सिंह
सभ्यता या सभ्य होने और कहलाने का अर्थ आज बाहरी दिखावा प्रदर्शन करना, आवश्यकताओं का बेकार विस्तार और तरह-तरह की वस्तुओं का अनावश्यक रूप में संग्रह ही बनकर रह गया है. इसके लिए चाहे वास्तविक सभ्यता, सृष्टि और उस सब के आधारभूत चीज़ों का सर्वनाश ही क्यों न हो. इस बात की ना तो किसी को चिंता है और ना ही इसे देखने सुनने का अवसर किसी के पास रह गया है. प्रदूषण से तरह-तरह के रोग और विषमताएं निरंतर तेज़ी पाती जा रही हैं. यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मानवता का दम अपनी ही गलतियों से घुट कर उसे इतिहास बना देगा.
सभ्यता के बढ़ते चरण:
मानवता का सभ्य होना आवश्यक और अच्छी बात है. सभ्य बातों, भावों, विचारों, उपकरणों का विस्तार या बढ़ाव भी बिलकुल बेकार नहीं कहा जा सकता है.
कभी हमने यह देखने का प्रयास नहीं किया है कि जिस तेजी से हम बढ़ते जा रहे हैं या बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, अपनी सभ्यता के विकास के लिए उससे भी कहीं अधिक तेजी से जीवन का मूल आधार प्रकृति हमारे पैरों तले आकर रौंदी जा रही है. हमारे पैरों तले सभ्यता विकास के नाम पर निरंतर रौंदे जाने पर जब उसका प्रतिशोध भाव सामने आयेगा, पता है तब क्या होगा? सर्वनाश, केवल सर्वनाश से ज़्यादा या कम कुछ नहीं होगा.
अपने सभ्य घर संसार बसाने के लिए खेतों-खलिहानों को तो छोड़िए, फलदार पेड़ों वाले बाग-बगीचों तक को नहीं बक्शा. नतीजा ये कि आज अनाज, फल और सब्जियां आदि सभी कुछ तो महंगा या बल्कि आम जनों के लिए मिलना मुश्किल ही हो गया है. सांस लेने के लिए तो ताज़ी हवा कहीं खोजने पर भी नहीं मिल पाती. आज नगरों, महानगरों में लोगों को बर्तन उठाए थोड़े से पीने के पानी के लिए इधर-उधर भटकते, आपस में लड़ते-झगड़ते देखा जा सकता है. यह बढ़ती सभ्यता का ही तो कहर है, जो वनों के निरंतर सिकुड़ते जाने के कारण, वर्षा के अभाव से पानी के अभाव के रूप में हमारे सामने आ रहा है.
इन तथ्यों के आलोक में हम केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि उतना ही खाना अच्छा होता है जितना ठीक तरह से पच सके, बाकियों के लिए भी बच सके. तो आने वाली पीढ़ियों ओर सभ्यताओं के समुचित विकास के लिए वनों को और तो नहीं सिकुड़ने देना है.
आशा की जा सकती है कि अब हम मात्र अपने वर्तमान की चिंता ना कर अपनी भावी पीढ़ियों का भी ध्यान करेंगे. उनके सभ्य बनकर जीने का अधिकार भी सुरक्षित रहने देंगे.
सभ्यता या सभ्य होने और कहलाने का अर्थ आज बाहरी दिखावा प्रदर्शन करना, आवश्यकताओं का बेकार विस्तार और तरह-तरह की वस्तुओं का अनावश्यक रूप में संग्रह ही बनकर रह गया है. इसके लिए चाहे वास्तविक सभ्यता, सृष्टि और उस सब के आधारभूत चीज़ों का सर्वनाश ही क्यों न हो. इस बात की ना तो किसी को चिंता है और ना ही इसे देखने सुनने का अवसर किसी के पास रह गया है. प्रदूषण से तरह-तरह के रोग और विषमताएं निरंतर तेज़ी पाती जा रही हैं. यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मानवता का दम अपनी ही गलतियों से घुट कर उसे इतिहास बना देगा.
सभ्यता के बढ़ते चरण:
मानवता का सभ्य होना आवश्यक और अच्छी बात है. सभ्य बातों, भावों, विचारों, उपकरणों का विस्तार या बढ़ाव भी बिलकुल बेकार नहीं कहा जा सकता है.
कभी हमने यह देखने का प्रयास नहीं किया है कि जिस तेजी से हम बढ़ते जा रहे हैं या बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, अपनी सभ्यता के विकास के लिए उससे भी कहीं अधिक तेजी से जीवन का मूल आधार प्रकृति हमारे पैरों तले आकर रौंदी जा रही है. हमारे पैरों तले सभ्यता विकास के नाम पर निरंतर रौंदे जाने पर जब उसका प्रतिशोध भाव सामने आयेगा, पता है तब क्या होगा? सर्वनाश, केवल सर्वनाश से ज़्यादा या कम कुछ नहीं होगा.
अपने सभ्य घर संसार बसाने के लिए खेतों-खलिहानों को तो छोड़िए, फलदार पेड़ों वाले बाग-बगीचों तक को नहीं बक्शा. नतीजा ये कि आज अनाज, फल और सब्जियां आदि सभी कुछ तो महंगा या बल्कि आम जनों के लिए मिलना मुश्किल ही हो गया है. सांस लेने के लिए तो ताज़ी हवा कहीं खोजने पर भी नहीं मिल पाती. आज नगरों, महानगरों में लोगों को बर्तन उठाए थोड़े से पीने के पानी के लिए इधर-उधर भटकते, आपस में लड़ते-झगड़ते देखा जा सकता है. यह बढ़ती सभ्यता का ही तो कहर है, जो वनों के निरंतर सिकुड़ते जाने के कारण, वर्षा के अभाव से पानी के अभाव के रूप में हमारे सामने आ रहा है.
इन तथ्यों के आलोक में हम केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि उतना ही खाना अच्छा होता है जितना ठीक तरह से पच सके, बाकियों के लिए भी बच सके. तो आने वाली पीढ़ियों ओर सभ्यताओं के समुचित विकास के लिए वनों को और तो नहीं सिकुड़ने देना है.
आशा की जा सकती है कि अब हम मात्र अपने वर्तमान की चिंता ना कर अपनी भावी पीढ़ियों का भी ध्यान करेंगे. उनके सभ्य बनकर जीने का अधिकार भी सुरक्षित रहने देंगे.

Comments
Post a Comment