पितृशाही की कील

- प्रियंका प्रियदर्शिनी 

जब पतरे देखे जाएंगे
सब मेल कराया जाएगा
गुण मेरे परखे जाएंगे
पंडित भाग्य बताएगा
क्या सीता मैं बन जाऊंगी
और राम कोई कहलायेगा
पाखंडो की अग्नि में क्या
मेरा सर्वस्व जलाया जाएगा
जब संज्ञा बदली जाएगी
विशेषण वही रह जाएगा
मेरी गरिमा जब अस्तित्व मेरा
पुरुष से जोड़ा जाएगा
कुण्डली का जो मेल न होगा
कुलच्छन मैं हो जाऊंगी
फिर मुझको पावन करने को
कुछ चंदन रगड़ा जाएगा
कुछ अक्षत छीटा जाएगा
चंद उपवास कराएंगे जाएंगे
कुछ मूरत पूजवाये जाएंगे
पुनः खोलेगा पंडित पतरा
छोटे अक्षर और नैन बड़े
कुछ समझ नही आएगा
खोखले मंत्रों को चिल्लाकर
वह पूंजी खूब बनाएगा
लड़की योग्य हो जाएगी
फिर चूल्हे में जाने को
इतना मूर्ख बहुत हो मानव
पितृसत्ता अपनाने को.

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