जेल डायरी- 2
- सुशील कुमार
दैनिक क्रिया से
इस समय तक
निवृत्त हो जाना
आम था.
पूरी गिनती का मिलान होने के बाद
गेट खोल दिया जाता था.
गेट खुलते ही अधिकांश फील्ड में हाज़िर होते थे.
कुछ जो कमरे से निकल कर
गैलरी में ही खड़े हो कर
बाहर के नजारे का मुआयना करते.
लगभग सबकी एकबारगी नजर
आमद अर्थात
जेल में आए नए कैदियों पर
ठहर जाना स्वाभाविक था.
जहां लाइन में लगाकर
अपराध के अनुसार अलग- अलग वार्ड में
भेजा जाना सुनिश्चित होता था.
इसी क्रम में सुबह की सैर में कदम
बढ़ते चले जाते,
ना जाने कब तेज़ हो जाते.
इन्हीं रफ्तार भरे कदमों में
कभी-कभी लगता था कि
टहलने के बाद
तो अजय भवन में
चलकर सबके साथ
नाश्ता करेंगे हीं!
लेकिन एकाएक सच्चाई से रूबरू होते...
....बेउर का फील्ड
अधिक बड़ा नहीं था, फिर भी
फील्ड के चारों तरफ की सड़क
7-8 सौ मीटर से
कम नहीं होगी,
टहलने के दौरान
तेज़ कदमों से
बढ़ाते-बढ़ाते
30 फेरा तक
पहुँचाया,
अखबारों के हेडलाइन से
रूबरू होने का यही
समय था.
सजायाफ्ता कैदी ही
अधिकांश
अखबार मंगाते थे.
कैंपस की खबरें
या
अपने आंदोलन की खबरें
जो जेल से बाहर हम लोगों के साथी
हम लोगों को जेल से बाहर कराने के लिए
लगभग रोज करते ही थे!
इसे आंखे सबसे पहले
ढूंढती थी.
पसीने से तर-बतर
वापस अपने वार्ड में
आने के साथ ही
चना-गुड़
हाज़िर रहता था,
जिसके मंजन करने के बाद ही
ब्रेड और चाय
मिल जाती थी.
दो लोगों
पर एक पैकेट ब्रेड
मिल जाती थी.
थोड़ी देर रुक कर
नहा लेना,
यही रूटीन बन
चुका था.
और इसी के साथ
7:30-8 बजे तक तैयार होने,
देर तक सोने
और अव्यवस्थित रूटीन की
बिगड़ी आदत को
जेल ने
कब व्यवस्थित कर दिया
पता हीं नहीं चला...
दैनिक क्रिया से
इस समय तक
निवृत्त हो जाना
आम था.
पूरी गिनती का मिलान होने के बाद
गेट खोल दिया जाता था.
गेट खुलते ही अधिकांश फील्ड में हाज़िर होते थे.
कुछ जो कमरे से निकल कर
गैलरी में ही खड़े हो कर
बाहर के नजारे का मुआयना करते.
लगभग सबकी एकबारगी नजर
आमद अर्थात
जेल में आए नए कैदियों पर
ठहर जाना स्वाभाविक था.
जहां लाइन में लगाकर
अपराध के अनुसार अलग- अलग वार्ड में
भेजा जाना सुनिश्चित होता था.
इसी क्रम में सुबह की सैर में कदम
बढ़ते चले जाते,
ना जाने कब तेज़ हो जाते.
इन्हीं रफ्तार भरे कदमों में
कभी-कभी लगता था कि
टहलने के बाद
तो अजय भवन में
चलकर सबके साथ
नाश्ता करेंगे हीं!
लेकिन एकाएक सच्चाई से रूबरू होते...
....बेउर का फील्ड
अधिक बड़ा नहीं था, फिर भी
फील्ड के चारों तरफ की सड़क
7-8 सौ मीटर से
कम नहीं होगी,
टहलने के दौरान
तेज़ कदमों से
बढ़ाते-बढ़ाते
30 फेरा तक
पहुँचाया,
अखबारों के हेडलाइन से
रूबरू होने का यही
समय था.
सजायाफ्ता कैदी ही
अधिकांश
अखबार मंगाते थे.
कैंपस की खबरें
या
अपने आंदोलन की खबरें
जो जेल से बाहर हम लोगों के साथी
हम लोगों को जेल से बाहर कराने के लिए
लगभग रोज करते ही थे!
इसे आंखे सबसे पहले
ढूंढती थी.
पसीने से तर-बतर
वापस अपने वार्ड में
आने के साथ ही
चना-गुड़
हाज़िर रहता था,
जिसके मंजन करने के बाद ही
ब्रेड और चाय
मिल जाती थी.
दो लोगों
पर एक पैकेट ब्रेड
मिल जाती थी.
थोड़ी देर रुक कर
नहा लेना,
यही रूटीन बन
चुका था.
और इसी के साथ
7:30-8 बजे तक तैयार होने,
देर तक सोने
और अव्यवस्थित रूटीन की
बिगड़ी आदत को
जेल ने
कब व्यवस्थित कर दिया
पता हीं नहीं चला...

Comments
Post a Comment