जेल डायरी- 3 (मुलाकाती)
- सुशील कुमार
वॉर्ड से निकलने के बाद
फील्ड पड़ती था.
सुबह की तुलना में
8-9 बजे तक अभी
फील्ड की स्थिति बदली होती है.
जेल के अंदर
बड़ी खुशी का
वक़्त "मुलाकाती"
यानी बाहर से किसी
परिजन या परिचित के
मिलने आने पर होता.
सबसे बड़ी खुशी
किसी भी 'जेल यात्री' के लिए
जमानत व रिहाई
होना होता!
जैसा कि मुझे भी हुआ.
मुलाकाती के आने
की आस में
फील्ड के समीप 'गुमटी'
पर इस समय तक
काफ़ी भीड़ हो चुकी होती थी.
सजायाफ्ता कैदियों में से
कोई एक,
जिसकी जिम्मेदारी होती,
वह पर्ची देख नाम पुकारता
व कन्फर्म होने पर पर्ची थमाता...
...अपना नाम आने पर
किसी को भी
अपार खुशी होती थी
जिसे शब्दों में बयां
कर पाना मुश्किल है.
पर्ची से ही
पता चल जाता
कि कौन मुलाकाती है.
पर्ची पर ही मिलने आने वाले
व्यक्ति की तस्वीर भी होती थी.
अन्य जेलों की क्या स्थिति है
नहीं पता लेकिन
बेउर केंद्रीय कारावास में
एक जेल यात्री से
कोई भी मुलाकाती
सप्ताह में एक बार ही
मिल पाता.
पर्ची मिलना
जॉइनिंग लेटर
मिलने जैसी खुशी तो नहीं थी,
लेकिन जिसे पर्ची
मिल जाए,
उसके चेहरे पर मुस्कान
देखते बनती थी.
मेन गेट की तरफ बढ़ने
के रास्ते में ही
बेउर अस्पताल
पड़ता है.
पर्ची लेकर
मुलाकाती गेट की तरफ़
बढ़ता,
खड़ा सिपाही
पर्ची के साथ
कम-से-कम
10 रुपये की उम्मीद
अन्य कैदियों से करता,
हालांकि
संगठन से होने की वजह से,
मुझे और अन्य साथ गए साथियों
को यहाँ भी लाभ मिला.
एक-दो बार
न देने
एवं सख्ती से बात करने पर
वह दूर से ही देख
कभी-कभी बिना पर्ची के भी
मुलाकाती खिड़की
की तरफ जाने देता.
मुलाकाती खिड़की की
संख्या
12 थी...
वॉर्ड से निकलने के बाद
फील्ड पड़ती था.
सुबह की तुलना में
8-9 बजे तक अभी
फील्ड की स्थिति बदली होती है.
जेल के अंदर
बड़ी खुशी का
वक़्त "मुलाकाती"
यानी बाहर से किसी
परिजन या परिचित के
मिलने आने पर होता.
सबसे बड़ी खुशी
किसी भी 'जेल यात्री' के लिए
जमानत व रिहाई
होना होता!
जैसा कि मुझे भी हुआ.
मुलाकाती के आने
की आस में
फील्ड के समीप 'गुमटी'
पर इस समय तक
काफ़ी भीड़ हो चुकी होती थी.
सजायाफ्ता कैदियों में से
कोई एक,
जिसकी जिम्मेदारी होती,
वह पर्ची देख नाम पुकारता
व कन्फर्म होने पर पर्ची थमाता...
...अपना नाम आने पर
किसी को भी
अपार खुशी होती थी
जिसे शब्दों में बयां
कर पाना मुश्किल है.
पर्ची से ही
पता चल जाता
कि कौन मुलाकाती है.
पर्ची पर ही मिलने आने वाले
व्यक्ति की तस्वीर भी होती थी.
अन्य जेलों की क्या स्थिति है
नहीं पता लेकिन
बेउर केंद्रीय कारावास में
एक जेल यात्री से
कोई भी मुलाकाती
सप्ताह में एक बार ही
मिल पाता.
पर्ची मिलना
जॉइनिंग लेटर
मिलने जैसी खुशी तो नहीं थी,
लेकिन जिसे पर्ची
मिल जाए,
उसके चेहरे पर मुस्कान
देखते बनती थी.
मेन गेट की तरफ बढ़ने
के रास्ते में ही
बेउर अस्पताल
पड़ता है.
पर्ची लेकर
मुलाकाती गेट की तरफ़
बढ़ता,
खड़ा सिपाही
पर्ची के साथ
कम-से-कम
10 रुपये की उम्मीद
अन्य कैदियों से करता,
हालांकि
संगठन से होने की वजह से,
मुझे और अन्य साथ गए साथियों
को यहाँ भी लाभ मिला.
एक-दो बार
न देने
एवं सख्ती से बात करने पर
वह दूर से ही देख
कभी-कभी बिना पर्ची के भी
मुलाकाती खिड़की
की तरफ जाने देता.
मुलाकाती खिड़की की
संख्या
12 थी...

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